VRINDAVAN INSTITUTE OF NATUROPATHY AND YOGIC SCIENCES is an authorized Work Integrated Vocational Education Center (WIVE) of Asian International University in India.

खानपान का तौर तरीका

By- Dr. Kailash Dwivedi 'Naturopath'

हमारे देश और विदेश के भोजन में तुलना करें तो हमारी शाकाहार और मांसाहार की परिभाषाओं मे ही काफी अंतर है। परेशानी यह भी है कि ऐसा ही अंतर हमारे देश में भी है। कुछ लोग अंडों को मांसाहार में शामिल करते हैं तो कुछ शाकाहार में। इसी तरह बंगाल में ब्राह्मण समाज के बहुत से लोग मछली को शाकाहार में मानकर उसका उपभोग करते हैं। ऐसे में शाकाहार और मांसाहार की सार्वभौमिक परिभाषा पर मतभेद होने से भी आंकड़ों पर असर पड़ता है।

भोजन की आदत खासतौर पर शाकाहारी और मांसाहारी के संदर्भ में भारत सरकार की ओर से जो आंकड़े जारी किए गए हैं,उनकी सत्यता को लेकरं इसीलिए कुछ संदेह होता है। आंकड़े जुटाने की कार्यशैली और उसके निष्कर्ष पर कोई संदेह नहीं है बल्कि संदेह का कारण हमारे समाज का ताना-बाना है। इसी ताने-बाने में के चलते हमें इस तरह की सच्चाई का सही-सही पता नहीं चल पाता कि कोई वास्तव में शाकाहारी है या मांसाहारी। वर्तमान परिस्थितियां कुछ इस तरह से बन गई हैं कि आप किसी जाति-समाज के आधार पर तय नहीं कर सकते कि उस विशिष्ट जाति या समाज का व्यक्ति मांसाहारी ही होगा या शाकाहारी ही होगा।

समाज स्तर के लिए झूठ

भारतीय समाज में सामाजिक स्तर बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई बार बेहतर समाजिक स्तर के लिए बहुत लोग झूठ बोल देते हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात में क्षत्रियों को छोड़कर अन्य सवर्ण कही जाने वाली जातियां आमतौर पर मांसाहारी नहीं हैं। लेकिन, कुछ जातियां जो सवर्ण नहीं हैं और परंपरागत तौर पर वे मांसाहारी रही हैं लेकिन अब उनका सामाजिक स्तर बेहतर होने से वे खुद को शाकाहारी के तौर पर ही घोषित करती हैं। ऐसे में सच्चाई को पकड़ पाना बहुत कठिन हो जाता है।

कई बार ऐसा भी देखने और सुनने में आता है कि कुछ परिवार परंपरागत रूप से शाकाहारी हैं लेकिन चिकित्सकीय कारणों से उस परिवार के किसी बच्चे को चिकित्सक पूर्ण रूप से मांसाहार नहीं तो अंडों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। ऐसे में बच्चों को अंडा खिलाने के कारण पूरे परिवार को ही मांसाहारी मान लिया जाता है।

इसी तरह बहुत से परिवारों में कोई एक सदस्य ऐसा भी होता है कि जो मांसाहार नहीं लेता लेकिन उसकी गिनती भी मांसाहारियों में हो जाती है। कभी-कभी जाने-अनजाने में भी लोग मांसाहार का उपभोग करने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सभी को पता है कि पुडिंग में और बहुत बार केक को तैयार करने में अंडे का इस्तेमाल होता है। कई बार पुडिंग खाने वाले इस बात से अनजान होते हैं तो कई बार वे अनजान बने रहने का नाटक भी करते हैं कि उन्हें पता ही नहीं और वे शाकाहारी होने का दावा भी करते हैं। ऐसे में स्पष्टता नहीं होती।

 

विदेशी व्यंजन और दावा

हमारा देश बहुत बड़ा है और अब तो लोग रोजगार के उद्देश्य से सरलता के साथ एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाते हैं। ऐसे में लंबे समय में खान-पान की आदतें बदलना बहुत ही स्वाभाविक भी है। गुजरात का व्यक्ति पंजाब में जाकर पंजाबी भोजन पसंद करने लगता है। उत्तर प्रदेश का व्यक्ति दक्षिण भारत में जाकर दक्षिण भारतीय व्यंजनों को खाने की आदत डाल लेता है। दक्षिण भारतीय लोग राजस्थान आकर वहां के व्यंजनों को पसंद करने लगते हैं।

बंगाल के लोग गुजरात आकर वहां का खाना अच्छा लगने लगता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक नई बात भी देखने को मिल रही है कि यहां लोग इटालियन, मैक्सिकन के साथ चाईनीज और थाई फूड को भी बेहद पसंद करने लगे हैं। खासतौर पर नई पीढ़ी को नए-नए स्वाद लेने में लुत्फ आता है। तरह-तरह के रेस्तरां और फास्टफूड चेन आ गई हैं। अक्सर यहां जाने वाले लोग झिझक के चलते कई बार पूछ भी नहीं पाते कि जो विदेशी व्यंजन वे खा रहे हैं, उसकी आधारभूत सामग्री किससे बनी है। वे शाकाहारी भी हो सकती हैं और मांसाहारी भी। लेकिन, शाकाहारी सी दिखने वाली खाद्य सामग्री को खाने वाले अकसर दावा यही करते हैं कि वे शाकाहारी हैं। ऐसे में इस तरह दावों के आधार पर बने आंकड़ों को स्वीकार करने में कुछ झिझक महसूस होती है।

बढ़ती बीमारियों का खतरा

तीन बड़े कारण है जो जंक  फूड को खतरनाक बनाते हैं। पहला यह कि इनमें प्रोसेस्ड चीज होती है, दूसरा फेट ज्यादा होता है और तीसरी बात यह कि जंक फूड में केलोरी ज्यादा होती है। हम देख रहे हैं कि इन तीनों की कारणों से घर का खाना खाने के बजाए वे लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होते हैं जिनमे खान-पान में जंक फूड ज्यादा होता है।

इस तरह के खान पान का नतीजा मोटापे को बढ़ाने वाला होता है। बर्गर, पिज्जा, समोसा के साथ-साथ कोल्ड ड्रिंक्स भी सेहत के लिए खतरनाक है। जंक फूड ने हमें खाने में पोषक तत्वों से दूर कर दिया है। बच्चों के मामले में तो ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि उनको शुरू से ही पोषक तत्व नहीं मिल पाएंगे तो रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी कमी होगी ही। हाल ही एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि तीस फीसदी अमरीकी ओवरवेट हैं।  भारत में भी जंक फूड ने जिस तरह से पैर पसारना शुरू किया है वह भी चिंता का कारण है। दिल्ली में हुए एक अध्ययन में पता चला कि स्कूल जाने वाले बच्चों में तीस फीसदी ओवरवेट हैं।

जीवनशैली जिम्मेदार

जंक फूड के प्रति ज्यादा आश्रित होना बीमारियों को न्योता दे रहा है। अत्यधिक चिकनाई व वसा युक्त भोजन से लीवर में फेट बढ़ जाता है। इनमें प्रोटीन की मात्रा तो लगभग होती ही नहीं जो सेहत के लिए ज्यादा जरूरती है। शुगर, ब्लड प्रेशर व ह्रदय रोग जैसी घातक बीमारियां इसी दूषित खान-पान का नतीजा है। शुगर की बढ़ती मात्रा मोटापे को बढ़ाने वाली होती है और मोटापा ही एक तरह से कई तरह की बीमारियों की जड़ है। हम यह भी देख रहे हैं कि न केवल खानपान की आदतों में बदलाव हो रहा है बल्कि लोगों ने आरामदायक जीवनशैली भी अपनाना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने खास तौर से बच्चों व युवाओं को मोबाइल से चिपका दिया है। बचा समय टीवी के सामने बैठे रहने में  बीतने लगा है।  जरूरी है कि अभिभावक भी जीवनशैली में  बदलाव लाएं।

बीमारियों में इजाफा

यह बात सच भी है ब्रेकफास्ट में जंकफूड के भारी इस्तेमाल ने दुनिया भर में बीमारियों में इजाफा ही किया है। दरअसल जंकफूड में चीनी का इतना इस्तेमाल होता है कि इसके सेवन से मोटापे की समस्या बढ़ी है। यही कारण में कि अमरीका में तो राष्ट्रपति की पत्नी मिशेल ओबामा ने बच्चों को ब्रेकफास्ट से दूर रखने का अभियान चलाया और वहां की सरकार ने भी इस अभियान में सहयोग किया। हमारे यहां खान-पान नियंत्रित रखने की बातें शुरू से ही कही गई है। दुर्भाग्य से पाश्चात्य देशों में खान-पान की जिन आदतों में बदलाव हो रहा है वे आदतें हमारे यहां बढती जा रही हैं। यहां भी वे ही तर्क दिए जा रहे हैं जो पाश्चात्य देशों में दिए जाते थे।

बच्चे भी लुभावने विज्ञापनों से आकर्षित होकर जंक फूड इस्तेमाल करने लगे हैं। पश्चिम की फूड इंडस्ट्रीज अपने यहां से बेदखल होती जा रहीं हैं और इन्होंने भारत में बाजार की तलाश शुरू कर दी है। एक हद तक अपने उत्पादों को बाजार में फैलाने में सफल भी हो रहीं हैं। मीट की खपत बढ़ाने का दावा भले ही किया जा रहा हो लेकिन यह ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता खतरा भी है। लाल मांस से भी स्वास्थ्य की समस्याएं हो रहीं है लेकिन ये उद्योग सुनियोजित मार्केटिंग में लगे हैं। अमरीका के सुपर बाजारों में 40 हजार तरह के खाद्य उत्पाद मिलते हैं।

कई खाद्य प्रसंस्करण उद्योग यहां जिस तरह के जंकफूड तैयार करते हैं उनके खाने से मोटापा और बीमारियां होती हैं। दुनिया के देशों में जीडीपी बढ़ती दिखाने का यह नया तरीका बन गया है। पहले खूब खिलाओ, बाद में बीमार करो। यानी आपके खाने में जितना ज्यादा प्रदूषण होगा उतनी ही जीडीपी बढ़ेगी। इसको यूं समझा जाना चाहिए। पहले फूड इंण्डस्ट्रीज ने बाजार फैलाया तो जीडीपी बढ़ी। बाद में बीमारियां बढ़ी तो दवाइयों का कारोबार करने वाली कंपनियों व इलाज करने वाले अस्पतालों ने जाल फैलाया। इससे जीडीपी बढ़ी। खाकर, बीमार हो गए तो आपकी बीमारी का इलाज कराने के लिए इंश्योरेंस कंपनियां आगे आ गईं। ये तीनों उद्योग आपस में इस तरह से जुड़े हुए हैं।  बीमा कंपनियों ने तो फूड इण्डस्ट्रीज में 4 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है।