By- Dr. Kailash Dwivedi 'Naturopath'
कुष्ठ रोग :
गलित कुष्ठ की चिकित्सा- इसमें छोटे-छोटे कई उपवास करने चाहिए और कम से कम एक मास
तक एनिमा लेना चाहिए। रोज सुबह, दोपहर, शाम तीनों समय गंगा के किनारे जाकर (या किसी अन्य नदी या
तालाब) किनारे की गीली मिट्टी का प्रलेप पूरे शरीर पर विशेषकर रोगी भाग पर लगावे
और एक घंटा तक या जब तक की शरीर पर मिट्टी सूख न जाये,
वहीं किनारे पर लेटा या बैठा रहे। तत्पश्चात् देर तक गंगा
में मल-मल कर स्नान करे। उसके बाद स्वच्छ कपड़ा पहनें। सप्ताह में दो बार भाप स्नान
लेकर शरीर का विकार पसीना के रूप में निकालें तथा 15-20 मिनट तक सुबह मेहन-स्नान और 15-20 मिनट शाम को कटि स्नान करें। रात को पेडू पर और रोग की जगह
पर मिट्टी की गीली पट्टी लगाकर सोयें। घावोें पर खुजली उठे तो हरी बोतल के
सूर्यतप्त नारियल के तेल में नीबू का रस मिलाकर लगावें। हरी और पीली बोतल का
सूर्यतप्त जल आधा-आधा भाग मिलाकर दिन में आठ खुराक पीवें (1 खुराक की मात्रा 50 ग्राम) प्रतिदिन सुबह 15-20 मिनट तक नंगे बदन धूप सेवन आवश्यक है। फल चाहे कम सेवन
किये जायें किन्तु कच्ची और उबली शाक सब्जी काफी मात्रा में खायी जाये। भीगे चने
के आधा किलो पानी दो तीन तोला शहद मिलाकर नित्य पीना,
चने की रोटी और शहद खाना (20 ग्राम सेे अधिक शहद न हो) शाम को चने का पानी गरत करके
बिना शहद डाले पीना, चने का साक कच्चा या पक्का खाना तथा दो मास तक लगातार केवल चने का व्यवहार
करना गलित कुष्ठ में आश्चर्यजनक रूप से लाभकारी होता है। कुष्ठ रोग में नमक और
चीनी को हाथ से छूना भी नहीं चाहिए।
श्वेत कुष्ठ की चिकित्सा- इस रोग में भी छोटे-छोटे उपवास करके और कुछ दिनों तक एनिमा
लेकर शरीर को शुद्ध कर लेना चाहिए तथा प्रतिदिन तीन बार गंगा के किनारे की गीली
मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिए। साथ ही स्नान के बाद सफेद दागों पर लाल बोतल के
सूर्यतप्त जल की मालिश 5 मिनट तक करनी चाहिए। यदि नदी या तालाब की गीली मिट््टी के मिने की सुविधा न
हो तो तुलसी के पेड़ की जड़ की मिट्टी तथा उसके पत्तों को एक साथ पीसकर सारे बदन पर
या दागों पर लगावें। साथ ही तुलसी की 10 पत्तियाँ रोज सुबह, शाम और दोपहर को खायें भी। चने का पानी शहद डालकर पीवें।
हरी और पीली बोतल का सूर्यतप्त जल एक हिस्सा, तथा आसमानी का दो हिस्सा मिलाकर उसकी 6 खुराकें प्रतिदिन लें। (मात्रा 50 ग्राम) साथ ही सारे शरीर पर पीला प्रकाश 15 मिनट तक, उसके बाद नीला 2 घंटे तक डालें। रात को सोते वक्त मूली के बीज को खूब पीसकर,
कागजी नीबू के रस में फेंटकर सफेद दागों पर लगाकर अरण्ड़ के
पत्ते से बांध दें तथा सुबह को उसे दही के योग से धोकर साफ कर दें। अंजीर के
पत्तों का रस दागों पर लगाने से भी लाभ होता है।
एक्जिमा :
चिकित्सा- प्रति
सप्ताह एक दिन का उपवास केवल जल पीकर और एनिमा लेकर करें। शीघ्र लाभ के लिए और
पुराने एक्जिमा में एक से तीन सप्ताह उपवास की आवश्यकता पड़ सकती है। पर तीन दिन के
उपवास से ही रोग की तीव्रता कम हो जाती है। उपवास के बाद 2-3 दिनों तक फलों के रस पर रहना चाहिए। फिर दो सप्ताह तक फल
और उबली तरकारियों पर। नमक बन्द रखना चाहिए। उसके बाद दूध,
फल और मेवों पर कुछ दिनों तक रहकर धीरे-धीरे सादे भोजन पर
आना चाहिए। फिर भी रोग जब तक जड़ से न जाये, भोजन में फल, दूध, मेवों और तरकारियों आदि क्षारधर्मी खाद्यों की अधिकता रखनी चाहिए। एक्जिमा के
रोगी को ढाई-तीन किेलो पानी प्रतिदिन पीना चाहिए। कब्ज टूटने तक एनिमा लेना चाहिए
औश्र कपड़े कम से कम पहनना चाहिए। गर्मी के दिनों में दो-तीन बार नहाना चाहिए और
नहाने के पहले और बाद में अपनी हथेलियों से सारे शरीर को रगड़कर लाल कर देना चाहिए।
रोग के स्थान को रगड़ से बचाये रखना चाहिए। दिन में कम से कम दो बार गंगा या किसी
अन्य नदी या तालाब के किनारे की गीली नीम का पानी मिली मिट्टी सारे बदन में लेप कर
और एकाध घंटे धूप में सुखाकर नदी के पानी में खूब मलकर स्नान कर लेना चाहिए। उसके
बाद हरी बोतल के सूर्यतप्त नारियल के तेल से सारे बदन की मालिश धूप में बैठकर या
लेटकर करवानी चाहिए। इसी तेल को एक्जिमा पर भी लगाना चाहिए। एक्जिमा पर भीगे कपड़े
की गद्दी रखकर मास में चार बार भाप स्नान तथा दो बार पूरे शरीर की गीली चादर की
लपेट देना चाहिए। प्रतिदिन रात को पेडू पर गीली मिट्टी की पट्टी लगाकर सोना चाहिए।
प्रतिदिन 2-3
बार एक्जिमा को 4-4 मिनट भाप में सेंक कर उसके बाद नमकीन पानी से धोकर उसपर
गीली मिट्टी की उष्णकर पट्टी बांधनी चाहिए। यह पट्टी 30-45 मिनट तक लगी रह सकती है। सप्ताह में दो बार एप्सम साल्ट
बाथ भी लेना लाभकारी होता है। हल्की कसरत जैसे 4-5 किमी टहलना तथा श्वांस की कसरतें प्रतिदिन करनी चाहिए।
आसमानी बोतल का सूर्यतप्त जल दिन में 6 बार पीना चाहिए (मात्रा 50 ग्राम) तथा एक्जिमा के स्थान पर हरा प्रकाश 15-20 मिनट तक डालना चाहिए।
भगन्दर :
चिकित्सा - दो तीन सप्ताह के लम्बे उपवास या रसाहार की इसमें जरूरत होती है। शेष सभी
उपचार फोड़ा के उपचार की भांति ही करने चाहिए। इस रोग में पीली और हरी बोतल का
सूर्यतप्त जल आधा-आधा मिलाकर दिनभर में आठ खुराक पीना चाहिए(50-50 ग्राम की खुराक)।
गूंगी :
चिकित्सा- दिन में तीन
चार बार 5 से 10 मिनट तक रोग के स्थान पर भाप देने के बाद बाकी समय उसे
काफी ठण्डे पानी में डुबाये रखना चाहिए। साधारण क्या केवल इतने ही उपचार से दर्द
में कमी आ जाती है। पानी में डुबाये रखने की बजाय गूंगी पर साफ कपड़े के एक टुकड़े
को खूब ठण्डे पानी से तर करके कई परत लपेट देना और उसे सदैव तर रखना भी लाभ करता
है। रात में गुंगी पर गीली पट्टी की पुल्टिस बांधनी चाहिए। जब गूंगी में पीव भरने
लगे तो दिन में तीन-चार बार 20-30 मिनट तक पहले गूंगी पर 5 मिनट तक भाप दें, फिर 5 मिनट तक ठण्डी पट्टी का प्रयोग करें। जब गूंगी को फोड़ा
बिल्कुल पक जाये तो सुई से उसमें छोटा से एक मुख कर देने से उसमें का रूका हुआ मल
और दूषित रक्त बाहर निकल जायेगा जिससे तकलीफ भी कम हो जायेगी और फोड़ा जल्दी सूखने
भी लगेगा। फोड़ा फूट जाने के बाद भी ऊपर का उपचार चलाते रहना चाहिए। साथ ही
प्रतिदिन सुबह-शाम कटि स्नान भी लेना चाहिए।
कखौरी :
चिकित्सा- इस रोग में
आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल का 2 भाग और पीली बोतल के जल का एक भाग मिलाकर दिन में उसकी 6 खराकें पिलानी चाहिए (मात्रा 50-5.
ग्राम) तथा जख्म पर आधा घंटा तक हरा प्रकाश डालना चाहिए।
बाघी :
चिकित्सा- इस रोग में
पूर्ण विश्राम आवश्यक है। प्रतिदिन दो समय सहने योग्य गरम पानी मेें कटि स्नान 3 से 5 मिनट तक लेना चाहिए। उस वक्त सिर को ठंडे पानी से धोने के
बाद मस्तक पर ठण्डे पानी से भीगा एक गमछा रखा होना आवश्यक है। गरम पानी का कटि
स्नान करने के बाद तुरन्त दो मिनट तक ठण्डे पानी का कटि-स्नान करना चाहिए। इस
क्रिया को एक ही समय दो तीन बार दोहराना चाहिए। शेष उपचार फोड़ा के उपचार की भांति
चलाना चाहिए।
उपचार से कभी बाघी बैठ जाती है और कभी पक-फूटकर मवाद के रूप
में शरीर का विष निकल चुकने के बाद धीरे-धीरे सूख जाती है।
खुजली :
चिकित्सा- आरम्भ में 2-1 दिन तक उपवास करना या फलों या साक-सब्जियों के जूस पर रहना
ठीक रहता है। इन दिनों एनिमा लेना न भूलना चाहिए। उसके बाद 3 से 7 दिनों तक फलों या उबली साग सब्जियों पर रहना चाहिए और
सप्ताह में एक बार सारे शरीर का भाप स्नान लेना चाहिए,
तथा उसके बाद कटि-स्नान। रात को पेडू पर गीली मिट्टी की पट्टी
बांधकर सोना चाहिए और रोगी हिस्से पर भी। कटि-स्नान रोज दो बार लेना आवश्यक है।
फलों या उबली साग-सब्जियों पर रहने के बाद रूचि अनुसार कच्ची साग-सब्जियां,
फल, उबली तरकारियां, हरा चना, कच्चा
दूध,
नीबू, गेंहू और चने के आटे की रोटी, शहद, मट्ठा तथा सूखे मेवे आदि में से दइो एक चीजें एक समय के भोजन में शामिल करके
खानी चाहिए। केवल 12 बजे दिन और 5 बजे शाम को ही भोजन करना चाहिए।
नीबू मिला पानी अधिक पीना चाहिए। नमक खाना बन्द रखना चाहिए।
सप्ताह में तीन बार सारे बदन की गीली मिट्टी का लेप लगाकर
धूप में बैठें और सूख जाने पर स्नान करें। या एक आदमकद टब में गरम पानी भरकर उसमें
20-30 मिनट तक लेटें।
जख्मों पर हरी बोतल का सूर्यतप्त जल दिन में 4 बार पीना चाहिए (मात्रा 50-50 ग्राम) तथा नीला या हरा प्रकाश 30 मिनट तक प्रतिदिन रोग की जगह पर डालना चाहिए या पूरे शरीर
पर।
इस रोग में सदैव हवा में रहना,
घूमना तथा गहरी श्वांस लेना चाहिए। इससे रक्त शुद्ध होकर
रोग के जाने में सहायता मिलती है।
दाद :
चिकित्सा- दाद के शुरू
होते ही तीन-तीन घंटे पर यदि थोड़ी देर गरम और ठण्डी सेंक देकर उस स्थान पर उष्णकर
गीली मिट्टी का प्रयोग किया जाये तो उसकी जड़ कट जाती है। सूखे दाद में उस अंग को
आधा घंटा तक गरम पानी में डुबो रखने से लाभ मिलता है। उसके बाद उसपर उष्णकर गीली
मिट्टी की पट्टी रखनी चाहिए।
दाद रोग की बढ़ी हुई दशा में और ठंडा दाद होने पर उस स्थान
को गुनगुने पानी में दिन में दो-तीन बार डुबो रखना चाहिए। तत्पश्चात् उस पर गरम और
ठंडी सेंक देनी चाहिए। प्रति दिन रात को सोते समय दाद वाले स्थान पर उष्णकर गीली
मिट्टी की पट्टी लगाकर सोना चाहिए। सप्ताह में एक दो बार पूरे शरीर की गीली चादर
की लपेट लगानी चाहिए तथा प्रति दिन दो बार कटि-स्नान लेना चाहिए। दिन में दो बार
दाद पर भाप स्नान देकर उसके बाद गीली मिट्टी की उष्णकर पट्टी रखने से भी लाभ होता
है। ज्वर रहने पर रात में पेडू पर भी गीली मिट्टी की उष्णकर पट्टी रखनी चाहिए। यदि
पेट साफ न हो तो कुछ दिन उपवास या रसाहार करके एनिमा द्वारा पेट साफ कर लेना
चाहिए। रोगी को नीबू मिला पानी प्रचुर मात्रा में पीना चाहिए और भोजन सप्राण और
सादा करना चाहिए।
आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल की 50-50 ग्राम की 4 खुराक प्रतिदिन पीने और दो घंटा तक नीला प्रकाश दाद पर
डालने से उस रोग में जल्दी लाभ होता है।
घमौरी :
चिकित्सा - प्रायः कुछ दिनों में आप से आप अच्छी हो जाती हैं। परन्तु इससे तकलीफ हो तो कई
दिनों तक रात भर के लिये पेडू पर गीली मिट्टी की उष्णकर पट्टी बांधनी चाहिए और
कब्ज हो तो प्रति दिन सुबह एनिमा लेना चाहिए। साथ ही प्रति दिन दो बार पूरे शरीर
पर गीली मिट्टी का लेप लगाकर और उसे सुखाकर स्नान कर लेना चाहिए। भोजन अनुत्तेजक
और सादा होना चाहिए। बरसात के पानी में खूब मल मलकर नहाने से भी घमौरी छूट जाती
हैं।
बेवाई :
चिकित्सा- इसमें रक्त को
साफ करने के लिए कुछ दिनों तक (3 से 7 दिनों तक) केवल फल खाकर रहना चाहिए। इन दिनों दोनों समय
गुनगुने पानी का एनिमा भी लेना चाहिए। फिर 7 से 15 दिन तक फल, दूध और मट्ठा पर रहें। इन दिनों भी जब पेट साफ न रहे तो शौच
से आने के बाद एनिमा लेना चाहिए। फल, दूध, मट्ठा के बाद धीरे-धीरे सादे भोजन पर आ जाना चाहिए। बेवाई जहां पर फटी हो उस
स्थान को नमक मिले गुनगुने पानी से धोकर या लाल बोतल के सूर्यतप्त तेल से वहां पर
धीरे-धीरे 15
मिनट तक दिन में 3-4 बार मालिश करना चाहिए। रोज स्नान के पहले और बाद शुष्क
घर्षण स्नान करना चाहिए।
छाला :
चिकित्सा- नया और मामूली
छाला,
उसपर कपड़े की ठंडी पट्टी बांध रखने और उसे बराबर तर करते
रहने से ही अच्छा हो जाता है। परन्तु जब अधिक दिनों तक यह प्रयोग चले तो दिन में
दो बार 10 मिनट तक छाले पर हल्की भाप भी जरूर देना चाहिए। जब छाले से
रक्त निकलता हो तो पट्टी को वर्फ जल में भिगो-भिगोकर छाले पर रखना चाहिए या छाले
वाले स्थान को ठंडे जल में काफी देर तक डुबो रखना चाहिए।
रोगी जब बहुत दिनों तक चारपाई पर पड़ा रहता है तो उसकी पीठ
आदि पर शैया-छत पड़ जाते हैं। उसके लिये प्रतिदिन दिन में तीन बार छत पर एक घंटा तक
ठंडी पट्टी और तीन बार पहले 5 मिनट तक भाप फिर 5 मिनट तक ठंडे पानी से भीगा और निचोड़ा गमछा 15 मिनट तक रखें। साथ ही छत को दिन में दो बार नमक मिले पानी
से धोना भी चाहिए।
पुराने छत में दीर्घ उपवास या छोटे-छोटे कई उपवास के साथ
एनिमा,
कटि-स्नान, पेडू की गीली मिट्टी की पट्टी तथा कमर की गीली पट्टी का
प्रयोग करके पहले पेट साफ कर लेना जरूरी होता है उसके बाद हर हप्ते पूरे शरीर की
गीली चादर की लपेट लगानी चाहिए। प्रतिदिन धुप में शरीर को गरम करके शाम-सुबह
कटि-स्नान लेना चाहिए। शाम को सोने से पहले 15 मिनट मेहन स्नान करना चाहिए। छाले पर कपड़े या मिट्टी की
गीली उष्णकर पट्टी 2 घंटा तक बदल-बदल कर रखनी चाहिए। दिन में एक दो बार छाले वाले स्थान को
गुनगुने पानी में काफी देर तक डुबोये रखना भी लाभ करता है। छाले को प्रतिदिन नीम
के पानी या नीबू का रस मिले पानी से धोकर साफ रखना चाहिए तथा नीबू का रस मिला पानी
प्रचुर मात्रा में प्रतिदिन पीना भी चाहिए।
मांस वृद्धि :
चिकित्सा- शरीर में
ट्यूमर की उत्पत्ति का पता लगते ही कुछ दिनों तक उपवास करके या रसाहार पर रहकर
कब्ज टूटने तक प्रतिदिन शाम को एनिमा लेना चाहिए। फिर उसके बाद ददो सप्ताह तक फल
या दूध या सादे भोजन पर रहना चाहिए। रोज साधारण स्नान के पहले और बाद में समूचे
शरीर की सूखी मालिश करनी चाहिए। दिन में दो बार तौलिया स्नान और सप्ताह में दो बार
एप्समसाल्ट बाथ देना चाहिए। हल्का व्यायाम और गहरी श्वांस की कसरतें भी बिना नागा
प्रतिदिन करनी चाहिए। रोग जब तक दूर न हो जाये तब तक ऊपर का कार्यक्रम कई बार
दोहराना चाहिए। रोग के स्थान पर मिट्टी की उष्णकर गीली पट्टी दिन में कम से कम दिन
में दो बार जरूर लगानी चाहिए।
जुल पित्ती :
चिकित्सा- ज्वर न हो तो दिन में दो बार समूचे बदन पर कीचड़ का
लेप कर उसके सूख जाने पर स्नान कर डालें। ठंडे जल की मालिश भी करनी चाहिए। कटि या
मेहन-स्नान भी रोज दो बार करना चाहिए। जरूरत हो तो एक स्टीम बाथ भी दे दें। उपवास, रसाहार
या फलाहार जब तक रोग न जाये करना चाहिए। ज्वर होने पर तीन बार तौलिया, दो बार
कटि-स्नान, रोग के स्थान पर 2-2 घंटा
बाद 3-4 मिनट
भाप देकर हर 20 मिनट के बाद ठंडी पट्टी बदल-बदलकर दें। पर हालत
सुधरने पर यह क्रिया दिन में केवल दो बार करें।