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प्राणायाम

By- Dr. Kailash Dwivedi 'Naturopath'


योगसूत्र के रचियता महर्षि पतंजलि द्वारा चार प्रकार के प्राणायामों का उल्लेख किया गया है-

बाह्यभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः। (योगसूत्र 2/51)

(क) बाह्यवृति प्राणायाम

(ख) अभ्यन्तरवृत्ति प्राणायाम

(ग) स्तम्भवृत्ति प्राणायाम

(घ) बाह्यभ्यन्तर विषयाक्षेपी प्राणायाम

(क) बाह्यवृत्ति प्राणायाम - प्राणवायु को शरीर से बाहर निकालकर बाहर ही जितने समय तक सुखपूर्वक रूक सके, रोके रहना और साथ ही साथ इस बात की परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहां ठहरा है ? कितने समय तक ठहरा है ? और उतने समय में स्वाभाविक प्राण की गति की कितनी संख्या होती है। यही बाह्यवृत्तिप्राणायाम है।

(ख) अभ्यन्तरवृत्ति प्राणायाम -प्राणवायु को भीतर ले जाकर भीतर ही जितने समय तक सुखपूर्वक रोक सके, रोके रहे और साथ ही साथ यह देखते रहना कि अभ्यन्तर देहज्ञ में कहा तक जाकर प्राण रूकता है, वहां कितने काल तक सुखपूर्वक ठहरता है। तथा प्राण की स्वाभाविक गति की कितनी संख्या होती है। यह अभ्यन्तरप्राणायाम है, इसे पूरकप्राणायाम भी कहते है, क्योकि इसमें शरीर के अन्दर ले जाकर प्राण को रोका जाता है।

(ग) स्तम्भवृत्ति प्राणायाम -शरीर के भीतर जाने और बाहर निकलने वाली जो प्राण की स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले जाने का अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभाव से बाहर निकाला हो या भीतर गया हो, जहां हो, वही उसकी गति को स्तम्भित कर देना और यह देखते रहना कि प्राण किस देश में रूके है, कितने समय तक सुखपूर्वक रूके रहते है, इस समय में स्वाभाविक गति की कितनी संख्या होती है, यह स्तम्भवृत्तिप्राणायाम है।

(घ) बाह्यभ्यन्तर विषयाक्षेपी प्राणायाम -प्राण बाहर है या भीतर साधक इसका ज्ञान त्याग कर केवल मन को इष्टचिन्तन में लगाने पर देश काल और संख्या के ज्ञान के अभाव में प्राण की गति का रूकना ही बाह्यभ्यन्तर विषयाक्षेपी प्राणायाम कहलाता है।

लाभ:-

उपरोक्त चारों प्राणायामों के अभ्यास के लाभ का वर्णन पतंजलि ने इस प्रकार कहा है कि जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायाम का अभ्यास करता है, वैसे-वैसे उसके संचित कार्य संस्कार और अविद्यादि क्लेश दूर होते चले जाते है। ये कार्य, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञान का आवरण है जिसके कारण मनुष्य का ज्ञान ढका रहता है और वह मोहित हुआ रहता है। प्राणायाम के अभ्यास द्वारा ही ज्ञान के प्रकाश को जागृत किया जा सकता है। इसके द्वारा ही मन में धारण करने की योग्यता उत्पन्न होती है अर्थात् मन को किसी भी जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है।

 

सावधानियाँ :-

प्राणायाम का अभ्यास करने से पूर्व प्राणायाम के नियमों की आवश्यक जानकारी और उनका पालन करना चाहिए। प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए तथा योग के तीनो चरणों का सफल अभ्यास करने के पश्चात प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम को सहज, सुखपूर्वक तथा स्वाभाविक रूप में ही करना चाहिए।

2. घेरण्ड संहिता के अनुसार प्राणायाम के प्रकार:-

सहितः सूर्यभेदन उज्जायी शीतली तथा।

भस्त्रिका भ्रामरी मूर्छा केवली चाष्टकुम्भिकाः ।।

(क) सहित,

(ख) सूर्यभेदी,

(ग) उज्जयी,

(घ) शीतली,

(ड़) भस्त्रिका,

(च) भ्रामरी,

(छ) मूर्छा,

(ज) केवली,

ये आठ प्रकार के प्राणायामों का उल्लेख किया गया है।

3. हठ योग प्रदीपिका के अनुसार प्राणायाम के प्रकार:-

सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारीशीतली तथा ।

भस्त्रिका भ्रामारी, मूर्छा प्लाविनीत्यष्टकुम्भकाः ।। (ह0प्र0 2/44)

(क) सूर्यभेदन

(ख) उज्जयी

(ग) शीत्कारी

(घ) शीतली

(ड़) भस्त्रिका

(च) भ्रामरी

(छ) मूर्छा

(ज) प्लाविनी

ये आठ प्रकार के प्राणायाम हठयोग प्रदीपिका में वर्णित है।

विविध प्रकार के प्राणायाम की विधियां, लाभ व सावधानियां:-

घेरण्ड संहिता और हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम के प्रकार में बहुत समानता है। दोनो में ही सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा का वर्णन है, और केवली घेरण्ड सहिता में तथा सीत्कारी और प्लाविनी हठयोग प्रदीपिका में ही वर्णित है। इनमें छः प्राणायाम दोनो ये ही माने गये है तथा 2-2 अलग प्राणायाम की भिन्नता भी देखने को मिलती है। घेरण्ड सहिता तथा हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम के विभिन्न प्रकार की विधि, लाभ व सावधानियां का वर्णन निम्नलिखित है।

1.सूर्यभेदी प्राणायाम:-

सूर्यभेदी प्राणायाम के द्वारा सूर्य स्वर अर्थात् पिंगला, नाड़ी का शोधन होता है, इसलिए इस प्राणायाम को सूर्यभेदी प्राणायाम कहते है। हठ योग प्रदीपिका में सूर्यभेदी प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार मिलता है।

’’आसने सुखदे योगी बद्ध्वा चैवासनं ततः ।

छक्षनाडया समाकृष्य बहिस्थं पवनं शनैः ।।

आकेशादनखाग्राच्च निरोधवधि कुंभयेत् ।

ततः शनैः सत्यनाड्या रेचयेत् पवनं शनैः ।। (ह0प्र0 2/48/49)

किसी पवित्र स्थान पर आसन बिछाकर उसके उपर पदमासन, स्वास्तिकासन आदि में या किसी भी सुखासन में बैठकर मेरूदण्ड, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुये बैठे। फिर दाहिनी नासिका से धीरे-धीरे पूरक करे तथा आभ्यन्तर कुम्भक कर मूलबन्ध व जालन्धरबन्ध यथाशक्ति लगाकर रखे तत्पश्चात कुम्भक तथा बन्ध खोलते हुये गर्दन सीधी करें और बायी नासिका से धीरे-धीरे रेचक करें। रेचक के समय उडडीयान बंध लगाये। इसके अतिरिक्त घेरण्ड सहिता में सूर्यभेदन प्राणायाम का कुछ इस प्रकार वर्णन है।

कथितं सहितं कुम्भं सूर्यभेदनकं श्रृणु।

पूरयेत् सूर्यनाडया च यथाशक्ति बहिर्मस्त्।।

अर्थात् सबसे पहले दाये नासिका से पूरक को यथाशक्ति कर पुनः प्रयत्नपूर्वक जालंधर मुद्रा से कुम्भक धारण करें। इसके पश्चात धैर्य से वेगपूर्वक वाम नासिका से रेचक करें। पुनः दाये नासापुट से श्वास खींचकर यथाविधि कुम्भक क्रम से रेचक करके बार-बार साधन करें।

पूरक, कुम्भक एवं रेचक का अनुपात 1:4:2 अर्थात् चार गिनती तक पूरक, सोलह गिनती तक कुम्भक और आठ गिनती तक रेचक करना चाहिए तथा धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाना चाहिए।

लाभ:- इस प्राणायाम के कई महत्व होते है। जिन्हे हठ योग प्रदीपिका और घेरण्ड सहिता में बताया गया है। इसके द्वारा कपाल की शुद्धि होती है। कफ जनित रोग जैसे खांसी, जुकाम, ब्रोन्काइटिस आदि को दूर किया जा सकता है। इस प्राणायाम के द्वारा शरीर में उर्जा उत्पन्न होती है जिसके द्वारा सर्दियों में इसके प्रयोग से ठंड इसके द्वारा मस्तिष्क की शुद्धि, वात द्वारा होने वाले रोगो तथा कृमि दोषो से होने वाले क्षय आदि रोगो को दूर किया जा सकता है। इसके द्वारा पाचन शक्ति बढ़ती है तथा अपच को दूर कर भूख बढ़ाने में लाभकारी है। इसके द्वारा यह गठिया, कब्ज, स्वप्न दोष, गले के रोग, उदर सम्बन्धित रोग, मस्तिष्क सम्बन्धित रोगो में लाभकारी है। यह प्राणायाम मधुमेह के रोगियों के लिए भी उत्तम है। रक्त दोष दूर होता है, चर्म रोग के लिए भी अच्छा है। इसके द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागरण करने में सफलता मिलती है।

सावधानियां:-

1. इस प्राणायाम को हृदय रोगियों को नहीं करना चाहिए।

2. उच्च रक्तचाप के रोगियों तथा पित्त प्रधान प्रकृति के लोगो के लिए यह प्राणायाम हितकर नहीं है।

3. इसका अभ्यास गर्मी के दिनो में अत्यधिक नहीं करना चाहिए तथा सर्दियों में इसका अभ्यास करना उत्तम है।

2.उज्जायी प्राणायाम:-

प्राण पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस प्राणायाम को उज्जायी प्राणायाम कहते है। उज्जायी का अर्थ है ऊर्जा ध्वनि। इस प्राणायाम को साधते समय गले द्वारा ऊँची ध्वनि निकलती है। हठ प्रदीपिका में इस प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार से है।

मुखं संयम्य नाडीभ्यामाड्डष्य पवनं शनैः।

यथा लगति कंठातु हृदयावधि सस्वनम्।।

पूर्ववतंकुभयेत्प्राणं रेचयोदिडया ततः।।

श्रलेष्यदोषहरं कंइे देहानल विवर्धनम् ।। (ह0 प्र0 2/51/52)

अर्थात्

पदमासन में बैठकर हाथो को अंजलि मुद्रा में रखते है बिना आवाज किये दोनो नासिका से पूरक करके जालन्धर तथा मूलबन्ध लगाकर कुम्भक करते है। साँस न रोक पाने की स्थिति में दाहिने हाथ की मुद्रा बनाकर बन्ध को खोल दे। तत्पश्चात उड्डियान बन्ध लगाते हुये बायीं नासिका से सांस का रेचन करते है। रेचन के समय उड्डियान बन्ध लगा रहेगा। ग्रन्थकार ने इस प्राणायाम का लाभ बताया है इसके द्वारा कंठगत श्लेष्मा के दोष नष्ट होते है और जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। आरम्भ में इसे पांच बार करे, धीरे-धीरे इसका अभ्यास एक घण्टे तक किया जा सकता है। लेकिन लम्बे अभ्यास में कुम्भक न करें।

लाभ:-

1. गले से सम्बन्धित रोगो जैसे गलकण्ठ, कण्ठमाल टांसिल, ग्वाइटर, खराश इत्यादि को दूर करता है।

2. थाइराइड एवं पैराथाइराइड ग्रंथियों पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

3. रक्त शुद्धि होती है।

4. स्त्री रोग जैसे श्वेतप्रदर, डिसमीनोरिया, गर्भाशय एवं मांसिक धर्म तथा पुरूष जनित रोग (स्वप्न दोष, नपुंसकता) को दूर करता है।

5. नाड़ी संस्थान पर अच्छा प्रभाव डालता है। मन को चिन्ताओं से मुक्त कर शान्त करता है।

6. दमे के रोगी भी शक्ति पर थोड़ा कुम्भक करके लाभ प्राप्त कर सकते है।

7. कब्ज, अपच, वायु विकार, खाँसी, ज्वर, प्लीहा, निम्न रक्तचाप आदि रोगो में लाभकारी है।

8. आत्मिक स्तर पर सूक्ष्म प्रभाव डालता है इसलिए ध्यान के अभ्यास के लिए उपयोगी है।

सावधानियाँ

इस प्राणायाम के अभ्यास को प्रारम्भ करते समय कुम्भक के बिना ही दोनो नासिका द्वारों से स्वर सहित पूरक और उससे दुगने समय में रेचक करना ही पर्याप्त है। नाक, मुख को सिकोड़ना या मुख की बुरी आकृति बनाकर प्राणायाम करना अनुचित है। इस प्राणायाम का अभ्यास उच्च रक्तचाप व हृदय रोगियों को नहीं करना चाहिए।

3.शीतली प्राणायाम:-

इस प्राणायाम से शरीर में अत्यधिक शीतलता की अनुभूति है। पदमासन में स्थिर होकर हाथो को अन्जली मुद्रा में रखते है। कमर व गर्दन सीधी रखते हुये दृष्टि सम रखते है। जीभ को मुख से बाहर निकालते है और नली के समान गोलाकार बनाते है। इसके पश्चात जीभ से ही आवाज के साथ सांस का पूरक करते है। ज्यो-ज्यो सांस का पूरक करते है त्यो-त्यो पेट बाहर की ओर फूलता है। पूरक के बाद जालन्धर बन्ध एवं मूल बन्ध लगते है। यथाशक्ति कुम्भक करते है। सांस न रोक पाने की स्थिति में जालन्धर बन्ध हटाते है। मूलबन्ध ढीला छोड़ते है। बिना आवाज किये दोनो नासारन्ध्रों से श्वास का रेचन कर देते है। रेचन की स्थिति में उड्डियान बन्ध लगाते है। इस प्रकार उपरोक्त विधि से यथाशक्ति इनका अभ्यास करते है।

लाभ:-

इस प्राणायाम के अभ्यास से बल एवं सौन्दर्य बढ़ता है। अनेक रोगो की निवृत्ति होती है। रक्त शुद्ध होता है। भूख-प्यास पर विजय प्राप्त होती है, ज्वर तथा तपेदिक रोग को दूर करता है। जहर के विकार को दूर करने के लिए सर्वोत्तम प्राणायाम माना जाता है। इसके सिद्ध हो जाने पर सर्प के डसने का भी असर नहीं होता। इसके निरन्तर अभ्यास करने से पित्त विकार उत्पन्न होते ही नहीं। यह प्राणायाम यकृत व प्लीहा के लिए अच्छा माना जाता है और उनसे उत्पन्न रोगो को दूर करने में लाभप्रद है। स्नायुओं को शिथिलता मानसिक स्थिरता एवं शान्ति प्रदान करता है। स्वर तन्तु स्वस्थ होकर वाणी सुरीली बनती है। सूर्यभेदन या अन्य प्राणायाम के पश्चात या किसी को गरमी अधिक लगती हो तथा खुश्की प्रतीत होती हो वे शीतली प्राणायाम का अभ्यास कर सकते है।

सावधानियां:-

1- इस प्राणायाम का अभ्यास शीतकाल या अत्यन्त शीत में नहीं करते।

2- कफ प्रकृति वालो के लिए हितकर नहीं है।

3- जुकाम, खांसी तथा ठंड से होेने वाले रोगो में इसका अभ्यास बन्द कर देना चाहिए।

4.शीतकारी प्राणायाम:-

शीतकारी प्राणायाम का वर्णन करते हुये हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है।

सीत्कां कुर्यान्तथा वक्क्षे प्राणेनैव विजुम्भिकाम्।

एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्वितीयकः।।

अर्थात्

पदमासन या सुखासन में बैठकर दांतो को आपस में मिलाकर जीभ को उनके साथ लगाये। होठो को खोलकर दांतो के मध्य से सीत्कार की आवाज के साथ पूरक करें। तत्पश्चात आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक के पश्चात दोनो नासारन्ध्रों से रेचक करें। अर्थात् मुख से श्वास खीचे और नाक से बाहर निकाले। यह एक आवृत्ति हुई। प्रारम्भ में पांच आवृतियां करें।

लाभ:-

इस प्राणायाम के अभ्यास से साधक में सौन्दर्य की वृद्धि होती है। वह योगी योगीनियों के समूह का सेवन करने योग्य होता है। भूख, प्यास, निद्रा और आलस्य आदि समाप्त हो जाता है। उसके शरीर व चित्त के दोष दूर हो जाते है। शरीर का बल बढ़ता है। अजीर्ण पित्त से उत्पन्न होने वाले रोग, रक्त, विकार, पेचिश, अम्ल, पित्त प्लीहा, आदि के रोगो में विशेष लाभकारी है। इसके निरन्तर अभ्यास से सफेद बाल काले हो जाते है। गर्मी को दूर करता है।

सावधानियां:-

इस प्राणायाम के अभ्यास के समय शीतली प्राणायाम में ध्यान रखने योग्य सावधानियों को ही मानना चाहिए तथा कुम्भक को यथाशक्ति ही करना चाहिए।

5.भस्त्रिका प्राणायाम:-

जिस प्राणायाम के अभ्यास के समय (पूरक व रेचक के समय) लौहार की धौकनी के समान आवाज की जाती है, उसे ही भस्त्रिका प्राणायाम कहते है।

इसको करने के लिए पदमासन या सुखासन में बैठकर, दाये हाथ की मुद्रा बनाकर नासिका से आवाज के साथ रेचक करके नासिका से पूरक करते है। यह रेचक इस प्रकार शब्द करते हुये करना चाहिए जैसे हृदय, कण्ठ व कपाल तक लगे फिर वेग के साथ ही पूरक करें तथा उसी प्रकार वेग से प्राण वायु का रेचक करें और उसी प्रकार पूरक करें। लौहार की धौकनी की भांति ही वेगपूर्वक बार-बार पूरक-रेचक करते है। जब शरीर श्रम का अनुभव करें तो इसके बाद सूर्य नाड़ी से पूरक करें और शीघ्र ही उदर को वायु से भर ले। तत्पश्चात् आभ्यन्तर कुम्भक करें। मूलबन्ध तथा जालन्धर बन्ध लगाये। कुम्भक के पश्चात इडा अर्थात चन्द्र नाड़ी से रेचक करें।

लाभ:-

यह सर्वश्रेष्ठ प्राणायाम है, वात, पित्त और श्लेष्मा तीनो का हरण करता है और जठराग्नि को बढ़ाता है। इससे सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति जाग जाती है। सुषुम्ना नाड़ी के मध्य जो ब्रह्य, विष्णु व रूद्र ग्रन्थियां है, विशेष रूप से उनका भेदन करने वाला प्राणायाम है। यह सर्दी से होने वाले रोगो को दूर करता है। पुरूष एवं नारी के समस्त गुप्त रोगो को दूर करता है। पेट के कृमि तथा मधुमेह के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके द्वारा सर्दी, जुकाम, एलर्जी, श्वास रोग, दमा, पुराना नजला, साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते है। हृदय व मस्तिष्क को भी शुद्ध प्राण वायु मिलने से आरोग्य लाभ होता है। रक्त परिशुद्ध होता है तथा शरीर के विषाक्त विजातीय द्रव्यों का निष्कासन होता है। थायराइड व टान्सिल आदि गले के समस्त रोग दूर होते है।

सावधानियाँ:-

1. हृदय रोगी व उच्च रक्तचाप होने वाली स्थिति में इस प्राणायाम को तीव्र गति से नहीं करना चाहिए।

2. गरमी में तथा शरीर में अत्यधिक गरमी बढ़ने के दिनो में इसे अल्प मात्रा में ही करना चाहिए।

3. इस प्राणायाम के अभ्यास के समय पूरक करने पर पेट नहीं फूलना चाहिए। श्वास केवल डायफ्राम तक ही भरनी चाहिए।

4. कफ की अधिकता के समय या किसी कारणवश नासाछिद्र जब ठीक से खुले हुये नहीं हो तो इस प्राणायाम के अभ्यास से पूर्व दाये स्वर को बन्द कर बाये से पूरक व रेचक करना चाहिए तथा बाद में बाये को बन्द करके दाये से ही पूरक और रेचक करना चाहिए। तथा अन्त में दोनो स्वरो से पूरक व रेचक करते हुये भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए।

5. प्राणायाम के अभ्यास के दौरान आंखे बन्द रखनी चाहिए तथा ओउम का मानसिक जाप करना चाहिए।

6.भ्रामरी प्राणायाम:-

इस प्राणायाम के अभ्यास में पूरक नासिका से करते है तथा रेचक के समय भ्रमर (भँवरा) की आवाज करते है इसे ही भ्रामरी कहते है। भ्रमर की आवाज कण्ठ से निकालने के कारण इसे भ्रामरी कहते है।

 

पदमासन या सुखासन में बैठकर, कमर व गर्दन सीधी रखते हुये दोनो नेत्र बन्द करके दोनो तरफ के कानो के छिद्रो को तर्जनी अंगुली से बिल्कुल बन्द कर दीजिए। तत्पश्चात दोनो नासारन्ध्रों से वेगपूर्वक गले से भ्रमर के समान शब्द उत्पन्न करते हुये पूरक करें। तत्पश्चात आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक में मूलबन्ध व जालन्धर बन्ध लगाये यथा शक्ति कुम्भक के पश्चात दोनो नासारन्ध्रों से भ्रमरी के समान शब्द करते हुये मंद-मंद गति से रेचक करें। मस्तिष्क में इस ध्वनि तरंगो का अनुभव कीजिए।

लाभ:-

इस प्राणायाम के निरन्तर अभ्यास से मन शान्त व एकाग्र होता है। इनसे मन की चंचलता समाप्त होती है। मन की वृत्तियों को एक स्थान पर बांधने के लिए, यह प्राणायाम वृहत व श्रेष्ठ है। रक्त दोष दूर होता है। तनाव दूर होने लगता, रक्तचाप व गले के रोग कम करता है। इसके द्वारा अत्यधिक विकास होता है। प्राण दीर्घ तथा सूक्ष्म हो जाता है। नाद के प्रति जागरूकता बनने के कारण नाद सिद्धि प्राप्त होती है जिससे परमानन्द की प्राप्ति होती है।

सावधानियां:-

1. इस प्राणायाम का अभ्यास रक्तचाप तथा हृदय रोगियों को नहीं करना चाहिए।

2. कान इस प्रकार बन्द करने चाहिए कि बाहर की ध्वनि सुनाई न दे।

3. भ्रामरी प्राणायाम के अभ्यास के दौरान होने वाली कम्पन को सहजता से अनुभव करना चाहिए।

7. मूर्छा प्राणायाम:-

इस प्राणायाम के अभ्यास से साधक को मूर्छा अर्थात बेहोशी आने लगती है। जब किसी प्राणायाम के उपरान्त जालन्धर बन्ध हटाकर धीरे-धीरे रेचक के पश्चात यदि मूर्छा अवस्था की अनुभूति हो तो उसे मूर्छा प्राणायाम कहते है। योगियों के अनुसार किसी भी प्राणायाम के बाद 5 से 10 मिनट का कुम्भक करने पर तथा रेचन करते समय मूर्छा की अनुभूति हो तो वह मूर्छा प्राणायाम कहलाता है। मूर्छा प्राणायाम का वर्णन करते हुये हठयोग प्रदीपिका में कहा गया हैः-

पूरकाते गाढतर बद्ध्वा जालंधर शनैः।

रेचयेन्मूच्र्छरव्येंय मनोमूच्र्छा सुखप्रदा ।।

अर्थात् पूरक करने के पश्चात अत्यन्त दृढ़ता के साथ जालन्धर बन्ध लगाकर शनैः शनैः प्राण का रेचन करना चाहिए। इसको बार-बार करने से मूर्छा सी आने लगती है। अभ्यास के साथ धीरे-धीरे अवधि में वृद्धि करने की कोशिश करनी चाहिए।

लाभ:-

इस प्राणायाम से साधक को बेहोशी जैसी आने लगती है। योगी इस अवस्था को सुखदायक मानते है। यह मन को अंतर्मुखी बनाता है। इसके द्वारा शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है तथा तनाव, चिन्ता तथा क्रोध को दूर करने के लिए उपयोगी प्राणायाम है। यह प्राणायाम समाधि की ओर जाने का प्रथम सोपान है।

सावधानियां:-

1. उच्च रक्त चाप के रोगियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

2. जिन साधको को चक्कर या मस्तिष्क खिचाव होता हो उन्हे इसका अभ्यास करना वर्जित है।

3. इसका अभ्यास किसी योग्य गुरू के समक्ष ही करना चाहिए।

8.प्लाविनी (केवली) प्राणायाम:-

किसी भी प्राणायाम की जिस अवस्था में साधक बाहर की सांस को बाहर ही और अन्दर की सांस को अन्दर ही रोक देता है तथा प्राण को ब्रह्यस्थ में पहुंचा देता है तो इसी स्थिति विशेष को केवली प्राणायाम कहते है। इस प्राणायाम को कुम्भक, रेचक और पूरक के बिना ही किया जाता है। इसलिए इसका नाम केवली प्राणायाम है।

इस प्राणायाम को किसी भी आसन में स्थिर रहते हुये मन में कल्पना आते ही प्राण को तुरन्त जहां का तहां रोक देते है यथा शक्ति कुम्भक के पश्चात छोड़ देते है। इस क्रिया को बार-बार करना होता है। प्राकृतिक स्थिति में श्वास के लेते तथा छोड़ते समय कभी भी रोक सकते है।

लाभ:-

1. इस प्राणायाम के अभ्यास से आयु मे वृद्धि होती है।

2. समाधि की स्थिति प्राप्त की जा सकती है।

3. मन की चंचलता दूर होकर स्थिरता तथा स्मरण शक्ति तीव्र होने लगती है।

4. इससे पसीने की दुर्गन्ध दूर होने लगती है।

5. शरीर कामदेव की भांति सुन्दर हो जाता है।

6. पृथ्वी की प्रत्येक वस्तु पर वश हो जाता है।

7. वाक शक्ति दृढ़ हो जाती है।

8. इस प्राणायाम से साधक के मल-मूत्र के लेपन से लोहा भी स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है।

सावधानियां:-

इस प्राणायाम का अभ्यास किसी प्रशिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए।

उपरोक्त प्राणायाम हठ योग की प्रदीपिका तथा घेरण्ड सहिता में वर्णित है। परन्तु कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्राणायाम भी है जो महान ऋषियों द्वारा बताये गये है वे निम्नलिखित है।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम या नाड़ी शोधन प्राणायाम:-

इस प्राणायाम से नाड़ियों को शुद्ध किया जा सकता है अर्थात् शरीर में निहित सम्पूर्ण नाड़ी मण्डल को शुद्ध किया जा सकता है इसलिए इसे नाड़ी शोधन प्राणायाम कहते है।

पद्मासन में बैठकर गर्दन और कमर सीधी रखते हुये आंखे बन्द करके बायी नासिका से श्वास को पहले बाहर निकाले तथा बायी नासिका से ही श्वास भरकर बायी नासिका को अनामिका और कनिष्ठ अंगुली से बन्द कर आन्तरिक कुम्भक कर दायी नासिका से अंगूठा हटा कर श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकाले। कुछ क्षण बाहर कुम्भक करें। फिर दाई नासिका से श्वास को भरे और आन्तरिक कुम्भक कर श्वास को रोके, फिर बाई नासिका से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकाल दें। इस प्रकार एक चक्र पूर्ण होता है। धीरे-घीरे अभ्यास द्वारा इन चक्रो की संख्या में वृद्धि करें। इसमें पूरक, कुम्भक, रेचक 1:4:2 के अनुपात से किया जाना चाहिए।

लाभ:-

1. इस प्राणायाम का महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसके द्वारा बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख दस हजार दो सौ नाड़ियां शुद्ध हो जाती है। सम्पूर्ण नाड़ियों के शुद्ध होने से शरीर स्वस्थ व बलिष्ठ बनता है।

2. इस प्राणायाम के द्वारा विभिन्न प्रकार के रोग संधिवात, तंत्रिका तंत्र के विकार, कम्पवात, आमवात, मूत्र रोग, अम्लपित, कफ रोग, नेत्र रोग, शीत-पित्त, गठिया, वीर्य क्षय, सर्दी, साइनस, टान्सिल आदि में लाभकारी है।

3. इसके द्वारा एकाग्रता बढ़ती है तथा मानसिक रोग दूर होते है। तनाव तथा अनिद्रा में भी लाभकारी है।

सावधानियाँ :

1. प्राणायाम सुबह-शाम किया जाना चाहिए ।

2. पूर्ण एकाग्र होकर ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए ।

3. प्राणायाम का अभ्यास खाली पेट तथा खाना खाने 4-5 घण्टे बाद ही करना चाहिए।

4. प्राणायाम का अभ्यास पूरक व रेचक करते समय सहजता से ही श्वास की क्रिया करनी चाहिए तथा दबाव व जोर नहीं करना चाहिए ।